लोकप्रिय पोस्ट

रविवार, 22 मई 2011

हिन्दुओ के धार्मिक ग्रन्थ भागवत में आपराधिक अश्लीलता.......


हिन्दुओ के धार्मिक ग्रन्थ भागवत में आपराधिक अश्लीलता.......




भागवत हिन्दुओ का पवित्र धरम ग्रन्थ है लेकिन भागवत में जिस अश्लीलता का नंगा नाच हमें देखने को मिलता है वह किसी अन्य धरम ग्रन्थ में देखने को नहीं मिलता ! यह एक ऐसा ग्रन्थ है जिससे समाज में अश्लीलता को बड़ावा मिल रहा है और समाज गलत दिखा में जा रहा है भागवत के कुछ प्रसंग देखिये --
           स्कंध १ अधाय १० मी विवाहित स्तारियो तक क्रिशन के साथ के अधरपान में भाव विभोर होकर अचेत हो जाने का वेर्नन है !
स्कंध ३ अद्धाय १५ में सनकादी कुमारो का जीकर आता है जो पूरी उम्र होकर भी नंगे धडंगे रहते है और वृद्ध , जवान ,और बालिकाओ के साथ लिंग खोले विचरण करते थे !
स्कंध १ अद्धाय १९ में शुकदेव का वर्णं आता है वह भी नंग धडंग रहते थे और स्तरीय जहा नहाती थी वाही पहुच जाते थे नंगी नहाने वाली स्त्रिया भी इनके सामने नंगी ही रहती थी!
ब्रह्मा ने अपनी पुत्री से ही संभाग किया था यह प्रसंग भागवत के स्कंध ३ अध्धय ३१ में आता है !
कश्यप की पत्नी दिति के बारे में आता है की वह कामातुर होकर सबके सामने ही कामुक हरकते करती थी और लोक लज्जा का कोई ध्यान नहीं रखती थी दिति की कथा स्कंध ३ अद्धाय १४ में आती है !
पांच पतियों वाली द्रोपती को सब जानते है लेकिन भागवत में एक ऐसी ओरत भी है जिसके दस पति थे यह मारिषा मान की ओरत दस पर्चेताओ की की पत्नी थी इसका वर्णंन स्कंध ४ अध्याय ३० में आया है !
स्कंध ५ अध्याय २४ में अतल लोक का वर्णन आया है जहा सत्रीया स्वंय पुरुष को हाटक रश पीला कर मदहोश करती है और जब वे धुत हो जाते है तो उनसे स्वंय चिपट जाती है और नंगा कर भोग में संगलन हो जाती है !
भागवत के स्कंध ८ अध्याय १२ में शंकर और मोहिनी का वर्णन का वर्णन आता है ! मोहिनी वस्त्र हिन् हो चुकी थी और शंकरजी उनकी और बढे तो वो शर्माने लगी और वह से चलने लगी शंकर उनके पीछे पड गए काम के वशीभूत होकर शंकर हथिनी के पीछे हाथी की तरह दोड़ने लगे और दोड कर पकड़ लिया ! तथा नंगी मोहिनी को अपने पास में भरकर आलिंगन करने लगे इससे मोहिने के बाल बिखर गए मोहिनी घयल होकर छूडा कर भागी तो शंकर फिर उनके पीछे भागने लगे ! काम के वेग से उनका भागते में ही वीर्य सख्लित हो गया ! वीर्य सख्लित ह०ओ जाने के बाद शंकर को होश आया !
भागवत में ही क्रिशन और गोपियों का जीकर आता है जिसमे भाग्वान्काहा जाने वाला क्रिशन नहाती हुई गोपियों के कपडे उठा कर पद पर चड जाता है और गोपियों से कहता है की तन खोले नंगी बाहर आ जाओ और अपने वस्त्र ले जाओ ! (स्कंध १०, अध्याय २२)!
क्रिशन की रासलीला का वर्णन भागवत में स्कंध १० में अध्याय २९ से ३३ तक पांच अध्यायो में किया गया है भागवतकार इतना रसिया है की क्रिशन रास लीला का अतिविश्तार से वर्णन करता है !गोपियों को विरह उद्धव का उपदेस सब इस रास लीला में आता है !
ब्रिज की नारिया  माँ , बाप , पति . बंधू ,सब छोड़ कर रात में क्रिशन के पास भाग कर चली आती है ! रासलीला में परे स्त्रियों के साथ नाचना , उनसे लिपटना और उनके साथ अश्लील हरकत करना कोई कर सकता है ? पर हिन्दुओ के भगवान ऐसा करते थे !
                                                                           भागवत समाज में अश्लीलता फैलता है ! जब भगवन कहा जाने वाले इतने बेशर्म और निर्लज्ज होगे तो साधारण आदमी तो अशलीलता के गर्त में क्यों न डूब जाएगा ?????????  
  by Sanjay Kumar 

वह मारा जाएगा


वह मारा जाएगा

♦ अश्विनी कुमार पंकज
देहरी लांघो
लेकिन धर्म नहीं
क्योंकि यही सत्य है
पढ़ो
खूब पढ़ो
लेकिन विवेक को मत जागृत होने दो
क्योंकि यही विष (शिव) है
हंसो
जितना जी चाहे
जिसके साथ जी चाहे
पर उसकी आवाज से
देवालयों की मूर्तियों को खलल न पड़े
क्योंकि यही सुंदर है
याद रखो
देहरी ही सत्य है
अज्ञान ही शिव है
धर्म ही सुंदर है
सत्यं शिवं सुंदरम का अर्थ
प्रेम नहीं है
जो भी इस महान अर्थ को
बदलना चाहेगा
वह मारा जायेगा
चाहे वह मेरा ही अपना लहू क्यों न हो

हिन्दुओ के भगवान हमेसा ब्राह्मण या सवर्ण ही क्यों ?? कोई दलित क्यों नहीं ??


हिन्दुओ के भगवान हमेसा ब्राह्मण या सवर्ण ही क्यों ?? कोई दलित क्यों नहीं ??






ऐसा नहीं है कि हमारा देश भुखमरों का देश है इसलिए भुखमरी है, गरीबों का देश है इसलिए गरीबी है और लाचारी व बेरोजगारों का देश है इसलिए लाचारी व बेरोजगारी है। इसके विपरीत तथ्य यह है कि हमारे देश में 15 प्रतिशत लोगों के पास इतना धन , इतना सोना, और इतना बैंक जमा है कि विश्व के पचासों देशों की पूरी जनसंख्या के पास होगा। हमारा देश कर्ज में डूबा है परंतु हमारे देश के इन 15 प्रतिशत (सवर्णों) के विदेशी खाते में जमा धन के ब्याज से ही भारत का पूरा कर्जा एक साल में उतर सकता है।
हमारे देश में 10 लाख मंदिर हैं जो अरबों-खरबों के सोने चांदी और अनेक आभूषणों से भरे पड़े हैं। यदि विश्व में सोने के तख्त पर कोई व्यक्ति बैठता है तो वह एक व्यक्ति भारत का गुरू शंकराचार्य ही है। कुछ समय पूर्व अभी एक शंकराचार्य की मृत्यु हुई थी तो उसका शव भी सोने के तख्त पर लिटाया गया था। भारत में 5 प्रतिशत उच्च जातीय जमींदार हैं जिनमें एक-एक के पास 10-10 हजार एकड़ भूमि के फ़ार्म हैं। इन जमींदारों के पास भी अरबों-खरबों की सम्पत्ति है। इनमें कुछ राज-घराने के लोग हैं जिनके पास अब भी अरबों-खरबों के खजाने हैं, स्वर्ण महल हैं और निजी हवाई जहाज हैं। ये जमींदार और सामन्त अपनी बेटी और बेटे के विवाहों में रत्न जड़ित गलीचों का बिछोना बिछाते हैं।
भारत का वैश्य वर्ग भी कम नहीं है। वह सुई से लेकर रेल, हवाई जहाज तक का उद्योग चलाता है। सोना-चांदी, हीरे जवाहरात , तस्करी का माल, गाय की चर्बी और जीवित इन्सानी बच्चों तथा स्त्रियों के साथ ही वह आदमी के खून तक की तिजारत करता है। खाद्य-पदार्थों, दवाओं और जहर तक में मिलावट कर धन बटोरता है। आज देश की एक तिहाई पूंजी उसके पास है।
सच यह है कि हमारा 85 प्रतिशत भारत गरीब है, भूखा है, नंगा है, बेघरबार है और लाचार है पर 15 प्रतिशत सवर्ण लोग धन की उबकाई करते हैं और इनके कुत्ते कारों में सफर करते हैं, पांच सितारा होटलों में पुडिंग और मलाई खाते हैं जिसकी उन्हें बदहजमी हो जाती है। भारत के भूगोल में जहां एक तरफ शहरी कूड़े-करकट के ढेरों के बीच सड़े गले प्लास्टिक और फूंस से ढकी मिट्टी या बांस के खम्बों की खड़ी दलितों की झोंपड़ियां हैं तो दूसरी ओर वहीं हिन्दुओं की बहुमंजिली इमारतें, ऊंचे-ऊंचे रंगमहल और शीशमहल बने हुए हैं। एक तरफ पेट भरने के लिए मेहनत मजदूरी भी पर्याप्त नहीं है तो दूसरी ओर हिन्दुओं के ऊंचे-ऊंचे औद्योगिक प्रतिष्ठान हैं, दुकानें, कारखाने हैं और भूमि के हजारों-हजारों एकड़ फार्म हैं। एक तरफ जहां दलितों का अपना कोई प्राइमरी स्कूल तक नहीं है वहीं दूसरी ओर हिन्दुओं के अपने डिग्री कॉलेज, मेडिकल कॉलेज और इंजीनियरिंग कॉलेज हैं। एक तरफ दलित गरीब के पास चलाने को टूटी साइकिल भी नहीं है तो दूसरी ओर एक-एक हिन्दू, सेठ, साहब और सन्यासी के पास 50-50 काफिलों में चलने वाली विलायती कारें हैं। दलित दरिद्र के मनोंरंजन का साधन मात्र उसकी पत्नी और उसके बच्चे हैं, जबकि हिन्दू महन्त, मठाधीश, ज़मींदार, शरमाएदार और सेठ चोटी से पैर तक अय्यासी में डूबे हुए रहते हैं। एक तरफ दलित मासूम बच्चों को 40-40 रूपये में पेट की खातिर बाजार में बेच देते हैं वहीं इन हिन्दुओं के अपने मसाजघर, मनोरंजन थियेटर, नाचघर, जुआघर और मयखाने हैं जहां जीवित मांस का व्यापार होता है।
हमारा देश गरीब है यह चीख-पुकार एक नाटक है, लाचारी है, हमारे देश में बेरोजगारी है यह भी एक नाटक है। गरीबी, बेरोजगारी और भुखमरी किसी देश में तब कही जा सकती है जब गरीबी, बेरोजगारी , लाचारी और भुखमरी से सब प्रभावित हों। हमारे देश में ऐसा नहीं है। हमारे यहां करोड़ों गरीब हैं और करोड़ों नंगे भी हैं। सच यह है कि हमारे यहां 15 प्रतिशत ऐसे लोग हैं जो सोना खाते हैं और सोने का ही वमन करते हैं। यहां मूल समस्या समाज में हिस्सेदारी की है। यदि 15 प्रतिशत के पास जमा सोना-चांदी, हीरे-जवाहरात के धन में हिस्सेदारी कर दी जाये तो भारत में एक भी व्यक्ति न भूखा सो सकता है न एक भी व्यक्ति नंगा रह सकता है। तब एक भी व्यक्ति न बेघरबार रह सकता है और न तब एक भी व्यक्ति बेरोजगार रह सकता है। यदि धर्मालयों का धन बाहर निकाल दिया जाय, भूमि का भूमिहीनों में वितरण कर दिया जाय और उद्योगों के लाइसेंस में एक व्यक्ति एक उद्योग कर दिया जाए तो हर तबाही तुरन्त दूर हो सकती है अथवा देवालयों, भूमि और उद्योग-व्यापार का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाय तो हमारा देश 132 वें स्थान से उठकर आज ही 32 वें स्थान पर आ सकता है।
देश की इस गर्दिश के लिए कौन उत्तरदायी है यह एक खुली किताब है। यह इन मुठ्ठी भर उच्च हिन्दुओं की स्वार्थ, शोषण दमन और भेदभावपूर्ण नीति का परिणाम है।
-पृ. 1-3, हिन्दू विदेशी हैं, लेखक एस.एल.सागर, सागर प्रकाशन 223 दरीबा,मैनपुरी, उ.प्र., द्वितीय संस्करण 1999 से साभार Posted by सत्य गौतम

शुक्रवार, 20 मई 2011

दोस्तों किसी साइबर अपराधी ने मेरे फेसबुक का पासवर्ड फिर से हैक कर लिया है..आपलोगों से अनुरोध है की किसी तरह की टिपण्णी पर अगली सूचना तक बिश्वास ना करें.मैंने अपनी तरफ से एक्शन ले लिया है. एक ऍफ़ आई आर दिल्ली पुलिस के साइबर सेल में कर दिया है . जिसकी एक कॉपी यहाँ पेस्ट कर रहा हूँ...क्षमाप्रार्थी ...ओम सुधा ९५४०६०४१२५

दोस्तों किसी साइबर अपराधी ने मेरे फेसबुक का पासवर्ड फिर से हैक कर लिया है..आपलोगों से अनुरोध है की किसी तरह की टिपण्णी पर अगली सूचना तक बिश्वास ना करें.मैंने अपनी तरफ से एक्शन ले लिया है. एक ऍफ़ आई आर दिल्ली पुलिस के साइबर सेल में कर दिया है . जिसकी एक कॉपी यहाँ पेस्ट कर रहा हूँ...क्षमाप्रार्थी ...ओम सुधा 9540604125  

दलित धर्म की अवधारणा और बौद्ध धर्म Written by कंवल भारती


 धर्मPDFPrintE-mail
Written by कंवल भारती   
दलित धर्म की अवधारणा और बौद्धSunday, 15 May 2011 05:46
17 मई को बुद्ध पूर्णिमा है. इस वक्त दलित समुदाय और बौद्ध धर्म के विषय में चर्चा वक्त की जरूरत है. इसी क्रम में कंवल भारती द्वारा लिखित पुस्तक ‘दलित धर्म की अवधारणा और बौद्ध धर्म’ का एक अंश दिया जा रहा है, जिसमें लेखक ने सूक्ष्म विश्लेषण के जरिए तमाम तथ्यों को सामने रखकर चीजों को देखा है. प्रस्तुत है.

बौद्ध धर्म से दलितों का रिश्ता सिर्फ इस कारण नहीं हो सकता कि उसे डॉ. आम्बेडकर ने स्वीकार किया था. डॉ. आम्बेडकर का बुद्धानुराग भी सिर्फ एक धर्म की तलाश के रूप में नहीं हो सकता था. यदि ऐसा होता, तो ईसाई, इस्लाम या सिक्ख धर्म भी दलित मानस से अपना रिश्ता बना सकते थे.  पर, ऐसा नहीं हुआ. ईसाई, इस्लाम और सिक्ख धर्मों में दलितों का सामूहिक धर्मान्तरण भी इन धर्मों से दलितों का रिश्ता नहीं बना सका. इसके विपरीत बौद्ध धर्म के प्रति वे दलित भी अनुराग रखते हैं या उदारवादी दिखाई देते हैं और उसका समर्थन भी करते हैं, जो बौद्ध धर्म के अनुयायी नहीं हैं. एक प्रश्न यह भी विचारणीय है कि दलित जातियों में ईसाई और इस्लाम धर्मों का व्यापक मिशनरी प्रचार भी उनके प्रति अपनत्व क्यों नहीं पैदा कर सका, जबकि यही अपनत्व बौद्ध धर्म के प्रति पागलपन की हद तक दलितों में पैदा हो गया? यह एक ऐसा सवाल है, जिस पर गंभीर विचार की जरूरत है, क्योंकि इसी सवाल पर दलित धर्म की मौलिक अवधारणा निर्भर करती है.
दलित धर्म का सवाल इसलिए उठाया गया, क्योंकि इसके बिना न तो बौद्ध धर्म से दलितों के रिश्ते को समझा जा सकता है और न अन्य धर्मों के प्रति दलितों के अलगाव को. यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी विचारणीय है कि कबीर और रैदास की विरासत भी दलितों को बौद्ध धर्म से जोड़ने में एक मजबूत कड़ी बन जाती है. सम्भवतः इसी आधार पर डॉ. धर्मवीर एक पृथक दलित धर्म को मान्यता देते हैं. यदि हम इस अवधारणा को लेकर चलें, तो हम कह सकते हैं कि डॉ. आम्बेडकर भी इस दलित धर्म की परम्परा से ही बौद्ध धर्म तक पहुंचे थे. बौद्ध धर्म उनका कोई आविष्कार नहीं है. वह उनकी एक मौलिक खोज है, जो दलितों को उनके धर्म और उनकी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ती है. एक गैर हिन्दू राष्ट्र के रूप में दलितों को विकसित करने की दिशा में उनकी इस खोज ने क्रांतिकारी भूमिका निभाई है.
अब हम यह देखने का प्रयास करेंगे कि इस दलित धर्म की अवधारणा क्या है और इसका बौद्ध धर्म तथा कबीर आदि दलित संतों की सम्पूर्ण विरासत से किस तरह का सम्बंध बनता है? इस धार्मिक विरासत में हम गोरखनाथ और सिक्खों के प्रथम गुरु नानकदेव को भी पाते हैं. उत्तर भारत के दलितों में गोरखनाथ बाबा और गुरु नानकदेव के प्रति असीम श्रद्धा और उनकी पूजा आज भी मौजूद हैं. दलितों में गुरु नानकदेव की प्रतिष्ठा सिक्ख धर्म के अस्तित्व में आने के काफी पहले हो चुकी थी, जो सिक्ख धर्म स्थापित होने के बाद भी कायम रहा. मतलब स्पष्ट है कि नानकदेव दलित धर्म से जुड़े बिना दलितों की श्रद्धा के पात्र नहीं बन सकते थे. यह जुड़ाव या समर्थन इतना प्रबल रहा होगा कि बाद में जब वे गुरु गोविन्द सिंह द्वारा स्थापित सिक्ख धर्म में पहले गुरु के रूप में शामिल कर लिए गये, तब भी वे दलितों के देव बने रहे.
इस दलित धर्म को समझने के लिए हमें पहले उसके सिद्धांतों की खोज करनी होगी. इन सिद्धांतों को खोजने के केवल दो तरीके हो सकते हैं. पहला तरीका दलित जातियों की सामाजिक समस्या या उनके रीति रिवाजों, परम्पराओं और सांस्कृतिक मूल्यों के अध्ययन का है. इस अध्ययन में हम यह देखेंगे कि दलितों की जो मान्यताएं हैं, उनकी समता दलित धर्म की विरासत से कितनी है? और यह भी कि उनका बौद्ध धर्म से भी क्या कोई रिश्ता बनता है? दूसरा तरीका यह हो सकता है कि हम, दलित धर्म के जितने भी गुरु हुए हैं या दूसरे शब्दों में दलित अस्मिता के जितने भी महानायक हुए हैं, उनमें से किसी एक को चुन कर उसकी प्रवृत्तियों का अध्ययन करें और उसके आधार पर दलित धर्म की अवधारणा का एक पैमाना बनायें. इस पैमाने से न सिर्फ हम मौलिक दलित धर्म को खोज सकते हैं, बल्कि बौद्ध धर्म से उसके रिश्ते का भी मूल्यांकन कर सकते हैं.
दलितों की सामाजिक समस्या
1911 की जनगणना में अछूतों की गणना बाकी लोगों से अलग करने के लिए दस मानदंड अपनाये गये थे, जिसके आधार पर उन जातियों और कबीलों की अलग अलग गणना की गई. डॉ. आम्बेडकर ने अपने एक लेख ‘अछूत और उनकी संख्या’ में इन मानदंडों का इस प्रकार उल्लेख किया है-
(1) ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को नहीं मानते. (2) किसी ब्राह्मण या अन्य मान्यता प्राप्त हिन्दू से गुरुदीक्षा नहीं लेते. (3) वेदों की सत्ता को नहीं मानते. (4) बड़े बड़े हिन्दू देवी देवताओं की पूजा नहीं करते. (5) ब्राह्मण जिनकी यजमानी नहीं करते. (6) जो किसी ब्राह्मण को पुरोहित बिल्कुल भी नहीं बनाते. (7) जो साधारण हिन्दू मंदिरों के गर्भगृह में भी प्रवेश नहीं कर सकते. (8) जिनसे छूत लगती है. (9) जो अपने मुर्दों को दफनाते हैं. (10) जो गोमांस खाते हैं और गाय की पूजा नहीं करते.
इन मानदंडों से की गयी 1911 की जनगणना में दलितों को गैर हिन्दू वर्ग माना गया. ये मानदंड आज भी प्रासंगिक हैं. आज भी दलित जातियां न तो वेदों की सत्ता को मानती हैं और न ब्राह्मण के प्रभुत्व को स्वीकार करती हैं. वे हिन्दू नहीं हैं, सिर्फ एक सेवक श्रेणी के रूप में उन्हें हिन्दू फोल्ड या हिन्दू व्यवस्था में रखा गया है.
ब्रिटिश स्कालर जी. डब्ल्यू. ब्रिग्स ने अपनी प्रख्यात पुस्तक ‘चमार' में लिखा है, ''मनु के अनुसार संसार की वे सभी जातियां, जो उस समुदाय से अलग हैं, जो (ब्रह्मा के) मुख, भुजा, उदर और पैर से पैदा हुई हैं, दस्यु कहलाती हैं, भले ही वे गंवारु भाषा बोलती हों या आर्यों द्वारा बोली जाने वाली भाषा.''  ब्रिग्स आगे लिखते हैं, ''वैदिक काल में भी दस्यु लोगों को हीन और अस्वच्छ मान कर उनसे घृणा की जाती थी. उनको कभी भी आर्य समुदाय में शामिल नहीं किया गया. ब्रिग्स के अनुसार ये लोग गांव के बाहर रहते थे और चामड़ तथा चर्मकार इन दो समूहों में विभक्त थे. वह लिखते हैं कि आज वे लोग ही चमार कहलाते हैं. दलित जातियों में चमारों की जनसंख्या सबसे अधिक है. 1911 की जनगणना के पूरे भारत के आंकड़ों से पता चलता है कि संख्या की दृष्टि से ब्राह्मण जाति पहले स्थान पर है और चमार दूसरे स्थान पर हैं. चमार हिन्दू होने की किसी भी अपेक्षा को पूरा नहीं करते हैं. 6 अन्य दलित जातियां भी इस स्थिति से बाहर नहीं हैं. इसलिए सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से यह निर्विवाद है कि दलित हिन्दू नहीं हैं.
अब हम दूसरे तरीके से यानि दलित मुक्ति के नायकों की प्रवृत्तियों के अध्ययन से उन सिद्धांतों की खोज करेंगे, जिनसे धर्म की अवधारणा को समझा जा सकता है.
दलित नायकों का धर्म
यदि हम मनु के इस कथन को दलित नायकों का धर्म मान कर चलें कि जो लोग ब्रह्मा के मुख, भुजा, उदर और पैर से पैदा नहीं हुए हैं, वे सभी दस्यु हैं, चाहे वे आर्य भाषा बोलते हों या गंवारु भाषा. तो दलित अपने नायकों की तलाश वैदिक काल से पूर्व के अनार्यों तक में कर सकते हैं. मनु वैदिक काल के दस्यु आदि अनार्यों को वर्ण व्यवस्था से बाहर की जातियां मानता है. दलित भी, जो अतिशूद्र है, वर्ण व्यवस्था से बाहर के हैं. क्योंकि मनु का कहना है कि सिर्फ चार वर्ण हैं, पांचवा कोई वर्ण नहीं है. इस स्मृति की व्याख्या करते हुए डॉ. आम्बेडकर ने लिखा है कि इसका अर्थ यह है कि मनु चातुर्वर्ण का विस्तार नहीं चाहता था. वह उन समुदायों को मिला कर पांचवें वर्ण की व्यवस्था के पक्ष में नहीं था, जो चारों वर्णों से बाहर थे. वह यह कह कर कि पांचवां वर्ण नहीं है, यह बताना चाहता है कि जो चातुर्वर्ण से बाहर है, उन्हें वह पांचवां वर्ण बना कर हिन्दू समाज में शामिल नहीं करना चाहता था.
अतः हमें यह मानना होगा कि सारी अछूत और दलित जातियां वर्ण व्यवस्था से बाहर की जातियां हैं, वे सभी अनार्य हैं, और कदाचित हिन्दू नहीं हैं. उनके नायकों की एक लम्बी सूची तैयार की जा सकती है. जिनकी प्रवृत्तियों का अध्ययन करके हम एक मौलिक धर्म और संस्कृति की खोज कर सकते हैं, जो पूर्व वैदिक काल से लेकर अब तक के दलितों के आचरण में हैं. यहां हम कुछ प्रमुख नायकों की प्रवृत्तियों का विश्लेषण करेंगे.
कबीर गुरुभक्त थे. वह हरिभक्त नहीं थे. उनकी दृष्टि में हरि का कोई महत्व नहीं था. गुरु को ‘कबीर साहब’ भी कहते हैं. यह कौन है,  इसका पता उनके इस पद से चलता है.
मोको कहां ढूंढे बंदे, मैं तो तेरे पास में। ना मैं देवल ना मैं मस्जिद, ना काबे कैलास में॥
खोजी होय तो तुरते मिलिहों, पल भर की तालास में। कहें कबीर सुनो भई साधो, सब स्वासों की स्वांस में॥
इस पद में कबीर ने साम्प्रदायिक ईश्वर का पूरी तरह खंडन किया है. ऐसा ईश्वर उनका न आराध्य है, न गुरु है. उनका गुरु, आतम राम' है. अर्थात, अपनी स्मृति, अपने को खोजना.
कबीर को और अन्य प्रवृत्तियां इन पदों में हैं -
सिरजन हार न ब्याही सीता, जल पषाण नहि बंधा।
दशरथ कुल अवतार नहि आया, नहि लंका के राव सताया॥
नही देवकी गर्भहि आया, नही यशोदा गोद खिलाया।
अर्थात, सिरजनहार (सृष्टा) ने सीता से विवाह नहीं किया था और न उसने समुद्र के ऊपर पत्थरों का पुल बांधा था. दशरथकुल में कोई अवतार नहीं हुआ और न उसने लंका के रावण को मारा. वह देवकी के गर्भ से भी पैदा नहीं हुआ और न उसे यशोदा ने गोद में खिलाया. इस प्रकार कबीर अवतारवाद का खंडन करते हैं.
अब देखते हैं कि रैदास की प्रवृत्तियां क्या हैं?  रैदास शुरू में ही कहते हैं,
चारों वेद करै खंडौति, जन रैदास करै दंडौति, यानि रैदास को दंडवत वही करे, जो वेदों का खंडन करे।
वेदों को नकार कर ही रैदास को स्वीकार किया जा सकता है. वे राम के भक्त भी नहीं हैं और न सेवक. वे योग यज्ञ भी नहीं करते हैं. वे उदास हैं, अर्थात, दास रहित स्वयं अपने स्वामी.
राम भगत को जन न कहाऊं सेवा करूं न दासा। जोग जग्य गुन कछू न जानूं ताते रहूं उदासा॥ रैदास वर्णव्यवस्था और उससे उत्पन्न जातिभेद तथा अस्पृस्यता का खंडन करते हैं.
रैदास जनम के कारने होत न कोई नीच। नर कूं नीच कर डारि है, ओछे करम की कीच॥
रैदास बांभन मत पूजिए जो होवे गुन हीन। पूजिए चरन चंडाल के जो हो ज्ञान प्रवीन॥
यानि जन्म के कारण कोई नीच नहीं होता, बल्कि कर्म उन्हें नीच बनाता है. रैदास यह भी कहते हैं कि गुणहीन ब्राह्मण को पूजने से अच्छा है ज्ञानी चांडाल को पूजना.
रैदास का धर्म जातिविहीन है, वह मनुष्य को महत्व देता है. धर्म की कोई जात नहीं न जात धर्म के माह. कबीर और रैदास की ही तरह दादू भी इसी धर्म के अनुयायी हैं. उनका मत भी यही है कि वे न हिन्दू हैं और न मुसलमान. उन्होंने हिन्दुओं के षट् दर्शन का भी खंडन किया है.
दलित धर्म के सिद्धांत
उपरोक्त दोनों तरीकों, अर्थात्‌ दलितों की सामाजिक समस्या तथा दलित नायकों की प्रवृत्तियों के अध्ययन के आधार पर दलित धर्म की अवधारणा को समझने के लिए निम्नलिखित सिद्धांत तय किये जा सकते हैं.
1) दलित हिन्दू नहीं हैं. 2) वे वेदों के ज्ञान में आस्था नहीं रखते हैं. 3) वे यज्ञ नहीं करते हैं. 4) वे गुरु को मानते हैं. 5) वे समतावादी हैं. 6) वे वर्ण व्यवस्था और जातिभेद का खंडन करते हैं. 7) वे स्त्रिायों की स्वतंत्राता के पक्षधर हैं. 8) वे एक निर्गुण, निराकार ईश्वर को मानते हैं. 9) वे जन्म जन्मांतरवाद, अवतारवाद और स्वर्ग नर्क की धारणाओं को अस्वीकार करते हैं. 10) ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को नहीं मानते और न उनसे गुरुदीक्षा लेते हैं. 11) वे हिन्दू देवी देवताओं की पूजा नहीं करते. 12) वे श्रमजीवी हैं, भीख मांग कर नहीं खाते हैं. 13) वे संस्कृत को नहीं, लोकभाषा को अपनाते हैं.
दलित धर्म की विशेषताएं
इन सिद्धांतों के प्रकाश में एक सार्वभौमिक दलित धर्म की खोज सहज ही की जा सकती है. यदि हम सम्पूर्ण दलित वर्गों के धार्मिक विश्वासों और कर्मकांडों का अध्ययन करें तो हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि वे विश्वास दलितों के एक पृथक धर्म का पता देते हैं. उपरोक्त सभी मान्यताएं उनके समाजों में मौजूद मिलती हैं. वे वर्णव्यवस्था से बाहर के लोग हैं, इसलिए हिन्दू व्यवस्था से भी बाहर के लोग हैं. हिन्दू व्यवस्था उनको गुलाम बना कर रखे हुए हैं. इस व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह करने और उससे निकल भागने के कारण ही हिन्दू उन पर अत्याचार करते हैं.
दलित श्रमजीवी हैं, कठोर श्रम करके जीविका कमाते हैं. इसी श्रम का हिन्दू व्यवस्था ने शोषण और दोहन किया है. उन्हें सामाजिक हीनता का शिकार बनाया है तथा उनको आर्थिक रूप से परतंत्रा बना कर उनके विकास को रोका है.
उन्हें शिक्षा से वंचित करके भी इसी साजिश के तहत रखा गया है कि उनमें विवेक का विकास न हो सके और वे मूल धर्म से न जुड़ सकें. वे गुरु को मानते हैं, पर इस बात से अंजान हैं कि विवेक ही उनका गुरु है. वे ईश्वरवादी हैं, पर राम, कृष्ण की साम्प्रदायिक धारणाएं भी उनमें मौजूद हैं, जो हिन्दू व्यवस्था के प्रभाव के कारण हैं. लेकिन भीतर से वे मूलतः निर्गुण के ही उपासक हैं.
दलित हिन्दू नहीं हैं, इसका प्रमाण है कि कई जगहों पर वो गाय का मांस खाते हैं और गाय को पूज्य नहीं मानते हैं. वे मुसलमान भी नहीं हैं, क्योंकि वे सुअर का मांस भी खाते हैं. यह सार्वभौमिक सत्य है कि भारत के किसी कोने में रहने वाला दलित हिन्दू नहीं है, भले ही वह हिन्दू व्यवस्था में रह रहा है. वह आज भी सत्ता से वंचित है, धन से वंचित है, सम्पत्ति से वंचित है, शास्त्र से वंचित है, शिक्षा से वंचित हैं और सामाजिक सम्मान से वंचित एक पृथक राष्ट्र के रूप में इस देश में रह रहा है. उसका इतिहास नष्ट कर दिया गया, उसके देवता नष्ट कर दिये गये, उसका धर्म नष्ट कर दिया गया, उसकी संस्कृति नष्ट कर दी गयी, वे तमाम प्रतीक खत्म कर दिये गये, जो उसकी पृथक पहचान स्थापित कर सकते थे. सिर्फ इसलिए कि एक सेवक श्रेणी के रूप में वह हिन्दू व्यवस्था में बना रह सके.
दलित और अन्य धर्म
इसका एक प्रमाण और भी है जो काफी गौर करने लायक है. वह यह है कि यह पूरी दलित आबादी ईसाई या मुसलमान क्यों नहीं हो गयी, जबकि इसका भरपूर अवसर उनको मिला था? क्या कारण है कि ईसाई और मुस्लिम मिशनरी भी इस गैर हिन्दू आबादी को अपने अपने धर्मों में तब्दील नहीं करा सके? उनके पास भी इसके पर्याप्त अवसर थे, जिसका वे लाभ उठा सकते थे. यदि मुस्लिम शासन में मुस्लिम मिशनरी या ब्रिटिश शासन में ईसाई मिशनरी इस गैर हिन्दू आबादी को मुस्लिम या ईसाई बना लेते, तो लाभ उनको ही होता. ऐसा क्यों नहीं किया जा सका? क्या ईसाई या मुस्लिम मिशनरियों ने प्रयास नहीं किया या फिर दलित जातियों ने उनके धर्मों में रुचि नहीं ली? मुझे लगता है कि दूसरा कारण ही सही प्रतीत होता है. मुस्लिम और ईसाई मिशनरियों ने दलितों में धर्मांतरण के प्रयास न किये हों, ऐसा नहीं कहा जा सकता; क्योंकि इन धर्मों में जिन दलित जातियों के लोगों ने धर्मांतरण किया था, वह इस प्रयास के कारण ही था. लेकिन वे मिशनरी पूरी दलित आबादी का धर्मांतरण कराने में सफल नहीं हो सके. इसका एक कारण यह बताया जाता है कि मुस्लिम शासकों ने ब्राह्मणवाद से यह समझौता कर लिया था कि वे हिन्दू समाज व्यवस्था को ध्वस्त नहीं करेंगे. उन्हें भी सेवकों की जरूरत थी, जो उन्हें हिन्दू व्यवस्था में गुलाम बना कर रखे गये दलितों में से ही मिल सकते थे. सम्भवतः इसीलिए लम्बे मुस्लिम शासन में भी दलितों को गुलामी से मुक्ति नहीं मिल सकी और धर्मांतरण के बाद भी नव मुस्लिम दलित, दलित ही बन कर जिये और दलित ही रह कर मरे. लेकिन, सिर्फ यही एक कारण नहीं हो सकता. यदि मात्र इसी कारण से मुस्लिम मिशनरी अपने मिशन में सफल नहीं हो सके, तो सवाल यह है कि ईसाई मिशनरी भी सफल क्यों नहीं हो सके, जबकि ब्रिटिश सरकार दलितों की मुक्ति के पक्ष में थी?
वास्तव में मुख्य कारण यही है कि दलितों ने ही इस्लाम और ईसाई धर्मों में रुचि नहीं ली. लेकिन, इससे कोई यह भ्रम न पाल ले कि कबीर और रैदास आदि ने एकेश्वरवाद की धारा चला कर दलितों को इस्लाम में जाने से रोक कर हिन्दुत्व की रक्षा की थी और दयानंद ने आर्य समाज की स्थापना कर दलितों को ईसाई धर्म में जाने से रोक कर हिन्दुत्व की रक्षा की थी. ये दोनों ही ऐतिहासिक सत्य नहीं है. दयानंद ने समाज सुधार के नाम पर वैदिक व्यवस्था की नई व्याख्या करके वर्ण व्यवस्था की रक्षा की थी तथा कबीर और रैदास आदि ने दलित धर्म की स्थापना करके हिन्दुत्व और इस्लाम दोनों से दलितों को बचाया था.
यह सच है कि कबीर और रैदास के कारण ही दलित जातियों के लोगों ने इस्लाम नहीं अपनाया था. पर, इसलिए नही कि उन्हें हिन्दुत्व से प्रेम था. जिस हिन्दू व्यवस्था में वे अस्पृश्यता और अपमान के शिकार थे, उससे उन्हें प्रेम हो ही नहीं सकता था. ऐसे धर्म को वे क्यों बचाना चाहेंगे, जिसमें उनकी कोई इज्जत नहीं है? उन्होंने यदि इस्लाम नहीं अपनाया था, तो इसलिए कि वे अपने ही धर्म के अनुयायी थे, जिसके गुरु कबीर और रैदास आदि दलित संत थे. उनके लिए उनका अपना धर्म ही मुक्तिदायक था. उनके लिए इस्लाम और हिन्दुत्व में अंतर नहीं था. दोनों में भाग्यवाद, कर्मवाद, स्वर्ग नर्क और पूजा पाठ के समान पाखंड थे. उनका धर्म जिसके गुरु और व्याख्याता कबीर और रैदास थे, इस पाखंडवाद से मुक्त था.